माँ की गोद से वृद्धाश्रम तक: जीवन का अधूरा सफ़र
बचपन में जब हम छोटे थे, हमारी दुनिया सिर्फ़ माँ की गोद तक सीमित थी। वही गोद हमें सुरक्षा देती थी, वही हाथ हमें गिरने से बचाते थे और वही आँखें हमारी छोटी-सी मुस्कान में ख़ुशी ढूँढ लेती थीं। उस समय हमें लगता था कि माँ-पापा हमेशा हमारे साथ रहेंगे, हमेशा हमारी देखभाल करेंगे।
लेकिन समय के साथ सब बदलता है। हम बड़े होते हैं, अपने सपनों और करियर में व्यस्त हो जाते हैं। कहीं नौकरी की मजबूरियाँ, कहीं परिवार की ज़िम्मेदारियाँ — धीरे-धीरे हमें माँ-पापा के साथ बिताने का समय कम होता चला जाता है। और कई बार, यह कमी इतनी गहरी हो जाती है कि वही माता-पिता, जिन्होंने हमें अपनी ज़िन्दगी दी, अपने जीवन के सबसे नाज़ुक पड़ाव पर अकेले रह जाते हैं।
बदलते रिश्तों का दर्द
आजकल यह आम हो गया है कि बुज़ुर्गों को अकेलेपन का सामना करना पड़ता है। बच्चे अपने कामकाज और निजी जीवन में इतने व्यस्त हो जाते हैं कि उनके पास माता-पिता से बैठकर बातें करने का भी समय नहीं होता। कभी वही बच्चे, जो माँ-बाप की उँगली पकड़कर चलते थे, अब उनका सहारा बनने से कतराने लगते हैं।
बुज़ुर्गों की खामोश दुनिया
वृद्धावस्था में शरीर कमज़ोर हो जाता है, लेकिन सबसे बड़ी तकलीफ़ अकेलेपन की होती है। टीवी की आवाज़, रेडियो के गीत और पुरानी यादें ही उनके साथी बन जाते हैं। वो खिड़की पर बैठकर इंतज़ार करते रहते हैं कि शायद आज कोई मिलने आएगा, शायद आज कोई उनकी खबर लेगा।
अनुभव का खज़ाना
हम भूल जाते हैं कि हमारे बुज़ुर्ग सिर्फ़ बुज़ुर्ग नहीं, बल्कि अनुभव का भंडार हैं। उनके पास जीवन की ऐसी सीख है जो किसी किताब में नहीं मिल सकती। उनकी कहानियाँ हमें धैर्य, संघर्ष और इंसानियत का असली अर्थ सिखाती हैं।
हमें क्या करना चाहिए?
हमारी सबसे बड़ी ज़िम्मेदारी यही है कि हम अपने माँ-बाप और बुज़ुर्गों को वह प्यार और सम्मान दें, जिसके वो हक़दार हैं।
रोज़ाना कुछ मिनट उनसे बातें करें।
उनके साथ बैठकर उनकी पुरानी यादें सुनें।
उन्हें यह एहसास दिलाएँ कि वो अकेले नहीं हैं।
आख़िर में…
माँ की गोद से लेकर जीवन के अंतिम पड़ाव तक, बुज़ुर्गों ने हमेशा हमारे लिए बलिदान दिया है। अब हमारी बारी है कि हम उनका हाथ थामें और उन्हें यह महसूस कराएँ कि उनकी ज़िन्दगी अधूरी नहीं है।
क्योंकि जिन माता-पिता ने हमें जीना सिखाया, उनके जीवन में हमारा साथ ही सबसे बड़ा सहारा है।




