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सार्थकता की खोज: इंजीनियर की कहानी

एक बड़े शहर में मनोरंजन  नाम का एक सफल सॉफ्टवेयर इंजीनियर रहता था। उसके पास अच्छी नौकरी, बड़ा घर और दुनिया की हर सुविधा थी। लेकिन जैसे-जैसे उसके माता-पिता बूढ़े होते गए और अंततः उन्हें स्वास्थ्य समस्याओं के कारण खो दिया, अमित को अपने जीवन में एक गहरा खालीपन महसूस होने लगा।

वह अक्सर सोचता था कि उसने अपने करियर में बहुत कुछ हासिल किया, बहुत पैसा कमाया, पर क्या उसके जीवन का कोई सच्चा उद्देश्य है?

अपने माता-पिता की सेवा करने का अवसर समाप्त होने के बाद, अमित ने अपना ध्यान समाज की ओर मोड़ा। उसने देखा कि बहुत से बुजुर्ग अकेलेपन और उपेक्षा का जीवन जी रहे हैं। उसके मन में विचार आया कि क्यों न वह अपने माता-पिता के नाम पर एक आधुनिक वृद्धाश्रम बनवाए।

अमित ने अपनी बचत का एक बड़ा हिस्सा लगाकर एक सुंदर और आरामदायक वृद्धाश्रम बनवाया। उसने अपने सभी दोस्त-रिश्तेदारों को उद्घाटन समारोह में बुलाया।

उद्घाटन के दिन, अमित मंच पर खड़ा था। उसने अपनी उपलब्धि के बारे में बोलना शुरू ही किया था कि अचानक उसे लगा, जैसे वह प्रशंसा और मान्यता पाने के लिए यह सब कर रहा है। उसके मन में बार-बार यही विचार आ रहा था, “क्या लोग मेरी तारीफ करेंगे? क्या यह वृद्धाश्रम सफल होगा? क्या मुझे इसके बदले समाज में सम्मान मिलेगा?”

उसी क्षण, उसे गीता का उपदेश याद आया: “कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन” (कर्म पर ही तुम्हारा अधिकार है, फल पर नहीं)।

अमित ने तुरंत अपना भाषण बदल दिया। उसने कहा, “दोस्तों, आज मैं यहाँ यह बताने के लिए खड़ा नहीं हूँ कि मैंने क्या दान दिया है, या मैंने कितनी मेहनत की है। मैंने यह वृद्धाश्रम किसी सम्मान, पुरस्कार या प्रशंसा की इच्छा से नहीं बनाया है।”

उसने आगे कहा, “मेरे माता-पिता अब मेरे साथ नहीं हैं। यह वृद्धाश्रम मेरे लिए केवल एक कर्तव्य है। यहाँ रहने वाले प्रत्येक बुजुर्ग में मुझे मेरे माता-पिता की छवि दिखाई देती है। मेरा कर्म केवल यह सुनिश्चित करना है कि यह जगह शांत, सम्मानजनक और प्यार से भरी रहे। इसका परिणाम क्या होगा—यह चलेगा या नहीं, लोग मेरी तारीफ करेंगे या नहीं—इसकी चिंता मुझे बिल्कुल नहीं है।”

अमित ने इसके बाद बोलना बंद कर दिया और चुपचाप नीचे आकर, बिना किसी से बात किए, पहला काम किया: उसने वृद्धाश्रम के सबसे बुज़ुर्ग सदस्य के पैर छूकर आशीर्वाद लिया।

अमित ने जब फल की इच्छा छोड़कर केवल निःस्वार्थ सेवा को अपना कर्म बनाया, तो उसे जो आंतरिक शांति मिली, वह उसकी पिछली किसी भी सफलता से बड़ी थी। और यही निःस्वार्थ भाव जल्द ही पूरे शहर में फ़ैल गया, जिससे उसका वृद्धाश्रम सेवा और सम्मान का सबसे बड़ा केंद्र बन गया।

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